71 वर्षीय देश के ख्याति प्राप्त शायर मुनव्वर राणा का दिल का दौरा पड़ने की वजह से रविवार देर रात निधन हो गया। उनकी बेटी सुमैया राणा ने मौत की पुष्टि की। उन्होंने लखनऊ पीजीआई में अंतिम सांस ली। उन्हें लंबे समय से किडनी की बीमारी थी। किडनी खराब होने के कारण डायलिसिस चल रहा था। साथ में फेफड़ों की गंभीर बीमारी सीओपीडी से भी परेशान थे। 9 जनवरी को हालत खराब होने पर लखनऊ के संजय पीजीआई अस्पताल के आईसीयू में भर्ती किया था ।
मुनव्वर राणा की बिगड़ती तबीयत को देखते हुए उनका बेटा उन्हें दिल्ली एम्स में शिफ्ट करने वाला था। उन्होंने शनिवार 13 जनवरी को एम्स के डॉक्टर से बातचीत कर मुनव्वर को शिफ्ट करने की तैयारी शुरू कर दी थी। इसी बीच मुनव्वर के निधन की सूचना के बाद वे दिल्ली से लखनऊ पहुंचे। बेटे तबरेज ने अपने पिता मुनव्वर राणा का शव अस्पताल से उनके लखनऊ के घर पर ले गए जहां लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। उनका पार्थिव देह रायबरेली में सुपुर्द-ए-खाक के लिए ले जाया जाएगा।
राणा के बेटे तबरेज़ राणा ने कहा कि बीमारी के कारण वह 14 से 15 दिनों तक अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें पहले लखनऊ के मेदांता और फिर एसजीपीजीआई में भर्ती कराया गया था, जहां रविवार रात करीब 11 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने कहा कि शायर के परिवार में उनकी पत्नी, चार बेटियां और एक बेटा है।
उल्लेखनीय है कि है कि 26 नवंबर, 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में जन्मे राणा को उर्दू साहित्य और कविता में उनके योगदान, विशेषकर उनकी ग़ज़लों के लिए व्यापक रूप से पहचाना गया। उनकी काव्य शैली अपनी सुगमता के लिए उल्लेखनीय थी, क्योंकि वे फ़ारसी और अरबी से परहेज करते हुए अक्सर हिंदी और अवधी शब्दों को शामिल करते थे, जो भारतीय श्रोताओं को पसंद आते थे।
उनकी सबसे प्रसिद्ध गजल मां थी, जो पारंपरिक ग़ज़ल शैली में मां के गुणों का जश्न मनाती थी।अपने पूरे करियर के दौरान, राणा को कई पुरस्कार मिले, जिनमें उनकी काव्य पुस्तक शाहदाबा के लिए 2014 में प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार भी शामिल है। हालांकि देश में बढ़ती असहिष्णुता से खिन्न होकर उन्होंने बाद में पुरस्कार लौटा दिया।
उन्हें प्राप्त अन्य पुरस्कारों में अमीर खुसरो पुरस्कार, मीर तकी मीर पुरस्कार, गालिब पुरस्कार, डॉ. जाकिर हुसैन पुरस्कार और सरस्वती समाज पुरस्कार शामिल हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
राणा ने अपना अधिकांश जीवन कोलकाता में बिताया और भारत और विदेशों दोनों में मुशायरों में उनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति थी। मुनव्वर राणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ विवादित बयान देकर देश भर में चर्चा में आए थे। उन्होंने आरएसएस की तुलना तालिबान से की थी।


