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Saturday, March 7, 2026

संस्कृत भाषा को भूमंडलीकृत वैज्ञानिक भाषा बनाने के लिए शोध और वैज्ञानिक प्रमाणों को जुटाना होगा- डॉ डीपी शर्मा

जयपुर स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में आज तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया इसका विषय था “संस्कृत भाषा ज्ञान प्रशिक्षण एवं शोध”/ इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे यूनाइटेड नेशन से जुड़े डिजिटल डिप्लोमेसी वैज्ञानिक, एक्सपर्ट एवं स्वच्छ भारत मिशन के प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन के ब्रांड एंबेसडर डॉ डीपी शर्मा, राष्ट्रवादी एवं राष्ट्रीय प्रखर वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में हरदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विद्या भारती के उपाध्यक्ष अवनीश भटनागर भी मौजूद रहे।

ICSSR और केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर के संयुक्त तत्त्वावधान में “भारतीयज्ञानप्रणाल्याः अध्ययने प्रशिक्षणे शोधे च उपहुतयः समाधानानि च” इस विषय पर त्रिदिवसीया अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। १६ सितम्बर को प्रातः संगोष्ठी का उद्घाटन समारोह आयोजित हुआ। सरस्वती पूजन के उपरान्त सहायकाचार्या साधना आर्या ने मंगलाचरण किया।
डॉ. कैलाशचंद्र सैनी ने स्वागतभाषण द्वारा समागत अतिथियों का स्वागत किया। तदुपरान्त संगोष्ठी के संयोजक डॉ. डम्बरुधर पति ने प्रास्ताविक द्वारा संगोष्ठी के विषय, लक्ष्य और उद्देश्य प्रस्तुत किये। उन्होंने बताया- “भारतीयज्ञानप्रणाली का निर्माण राष्ट्र के प्रति समर्पण हेतु है। ज्ञानविज्ञान की भाषा संस्कृत न केवल भाषा में, अपितु जीवन में होनी चाहिए। जब चुनौतियों और उनके समाधानों पर विचार किया जाएगा, तब भारतीयज्ञानप्रणाली का क्रियान्वयन होगा।”

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अन्तर्राष्ट्रीय डिजिटल कूटनीतिज्ञ, स्वच्छभारताभियान के राजदूत प्रो. डी. पी. शर्मा मुख्यवक्ता के रूप में उपस्थित थे। उन्होंने अपने भाषण में बताया- “संस्कृत भाषा सबसे ज़्यादा संरचित भाषा है। संदिग्ध शब्द एवं वाक्यांश की समस्या को दूर करने के लिए रूल बेस्ड लैंग्वेज होने के कारण संस्कृत भाषा एआई के लिए सबसे उपयुक्त हो सकती है मगर इस पर गहन शोध एवं अध्ययन करने की आवश्यकता है, मगर कपोल कल्पित बातें करने से काम नहीं चलेगा ।श्रहमें विचारधाराओं को वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ धरातल पर उतारने की आवश्यकता है। कम्प्यूटर की प्रायोगिक संरचना की अवधारणा वैदिक गणित से ली गई है। हमें इन्वेंटर नहीं रिइन्वेंटर बनना है।”

कार्यक्रम में विशिष्टातिथि के रूप में उपस्थित विद्याभारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अवनीश भटनागर ने कहा, “भारतीयज्ञानप्रणाली में अध्ययन- अध्यापन, प्रशिक्षण और शोध के क्षेत्रों में अनेक अवसर हैं।भारतीयज्ञानपरम्परा २०२० का विषय नहीं है, यह अत्यन्त प्राचीन और शाश्वत है। हमें प्राणियों में सद्भावना जाग्रत करना है- जो धर्म की जय और अधर्म के नाश से सम्भव है। अतः हम सभी अपने कर्तव्यों को समझें, सभी के साथ रहने की भावना रखें।”

कार्यक्रम में सारस्वतातिथि के पद पर हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने कहा- “पत्रकारिता ने भारतीय इतिहास को बनाने के लिए क्रांति का काम किया। जैसे- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, पं. मदन मोहन मालवीय, महावीर प्रसाद द्विवेदी। आज़ादी के पहले की पत्रकारिता और पत्रकारों ने देश के स्व को जगाया- जिसमें संस्कृत की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।” तदनन्तर २ खण्ड में अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी की शोधपत्रिका “शिक्षादृष्टि” का समागत अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया। इस पत्रिका में चयनित १३५ लेख प्रकाशित किए गए हैं, जिसके सम्पादन कार्यक्रम के संयोजक डॉ. डम्बरुधर पति हैं।

तदनन्तर मुख्यवक्ता समाजसेवी पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ ने कहा- “संस्कृत के सभी शब्दों के पीछे दर्शन छिपा हुआ है। सभी शब्दों से भारतीय संस्कृति का इतिहास प्रतिबिंबित होता है। भारतीयसंस्कृति की श्रेष्ठता पर समस्त युवाओं को गर्व होना चाहिए। समसामयिक उदाहरण देकर कुलश्रेष्ठ ने बताया कि भारतीयता के संरक्षण की प्रथम सीढ़ी है। दुनिया भारतीय संस्कृति क मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और चाणक्य की नीति से जानता है। भारतीयता के संरक्षण की पहली सीढ़ी है विश्वविद्यालय के छात्रों, आम नागरिकों को अन्तःकरण में राष्ट्रीयता को जगाया जाए।”
कार्यक्रम की शृंखला में पत्रकारिता सम्मान कार्यक्रम रखा गया जिसमें अनेक प्रतिष्ठित पत्रकारों का सम्मान विश्वविद्यालय के पक्ष से किया गया। उपस्थित अतिथि प्रतिष्ठित पत्रकार एल.सी. भारती ने कहा कि संस्कृत को बढ़ाने के लिए इसे रोज़गार परक बनाना होगा। मैं संस्कृत में लेख कविता आदि लिखने वाले छात्रों के लिए अपने अख़बार का एक पृष्ठ आरक्षित करता हूँ जिससे संस्कृत छात्रों की पत्रकारिता क्षेत्र में रुचि बढ़े।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. वाई. एस. रमेश ने बताया कि- “समागत अतिथियों का मार्गदर्शन इस संगोष्ठी में पाथेय रूप सिद्ध होगा। हमें उस मार्ग का चयन करना होगा जिससे विनाश के स्थान पर विकास हो।” अन्त में कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अंजू चौधरी ने किया। इस कार्यक्रम का सफल संचालन परिसर के सहायकाचार्य नरेश सिंह ने किया।

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