करौली (राजस्थान)। राजस्थान के करौली जिले में स्थित एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर है, जो देवी कैलादेवी को समर्पित है। यह त्रिकुट पहाड़ियों के बीच कालीसिल नदी के किनारे स्थित एक शक्तिपीठ है और प्रतिवर्ष लाखों भक्तों को आकर्षित करता है त्रिकूट पर्वत पर स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर श्रद्धालुओं की गहन आस्था का केंद्र बना हुआ है।
दीपक की लौ में होते हैं माता के दिव्य दर्शन
इस मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि नवरात्रि के दौरान माता के गर्भगृह में बिजली की कोई व्यवस्था नहीं होती। वर्षों पुरानी परंपरा का पालन करते हुए भक्तजन माता के दर्शन केवल घी और तेल के दीपकों की रोशनी में करते हैं। यह इसे राजस्थान का पहला ऐसा मंदिर बनाता है जहां आधुनिक रोशनी के बजाय श्रद्धा की लौ से मां के दर्शन होते हैं। इस आलोकिक अनुभव को देखने और जीने हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं।
कालीसिल नदी का स्नान और भौंरा भगत का मंदिर
कैला देवी के दर्शन से पहले पास ही बहने वाली पवित्र कालीसिल नदी में स्नान को अनिवार्य माना गया है। मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने से शारीरिक कष्ट और रोग दूर हो जाते हैं। यही नहीं, माता के दर्शन को पूर्ण तभी माना जाता है जब भक्त भौंरा भगत के मंदिर में जाकर मत्था टेकें। यह परंपरा मंदिर दर्शन की संपूर्णता का प्रतीक मानी जाती है।
नवरात्र में विशेष पूजा, अनुष्ठान और भोग
नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर में भव्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। 17 विद्वान पंडितों द्वारा प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के 15 पाठ, देवी भागवत का एक पाठ, और भैरव स्रोत के 108 पाठ किए जाते हैं। संध्या के समय विशेष रूप से चौमुखा दीपक की बली दी जाती है।
माता को हर दिन अलग-अलग प्रकार का भोग अर्पित किया जाता है—
• पहले दिन मालपुआ,
• दूसरे दिन खीर,
• तीसरे दिन मिष्ठान,
• और बाकी दिनों में मेवा व फल।
यह सब आयोजन मां कैला देवी की असीम कृपा और भक्तों की आस्था का जीवंत प्रमाण है। 900 वर्षों पुराना है मंदिर, सोने का है शिखर करीब 900 वर्ष पुराने इस शक्तिपीठ में मां कैला देवी की मुख्य प्रतिमा में महालक्ष्मी स्वरूपा विराजित है, वहीं दूसरी प्रतिमा चामुंडा देवी की है। मंदिर का शिखर शुद्ध सोने से बना हुआ है, जो इसे और भी भव्य व दिव्य बनाता है।


