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Saturday, March 7, 2026

दिवाली पर काले कपड़े क्यों पहनता है राजस्थान का पूर्व शाही परिवार? जानें सदियों पुरानी परंपरा

जयपुर। दिवाली का त्योहार जहां रंग-बिरंगे कपड़ों, रौशनी और उमंग का प्रतीक माना जाता है, वहीं भारत के ऐतिहासिक शहर जयपुर का शाही परिवार इस पर्व को बेहद अलग अंदाज़ में मनाता है। हर साल दिवाली पर राजपरिवार के सभी सदस्य काले रंग की पोशाक पहनते हैं। एक परंपरा, जो सदियों से चली आ रही है और अपने आप में शौर्य, बलिदान और स्मरण की मिसाल है।

युद्ध के बलिदान की स्मृति में काली दिवाली

जयपुर राजघराने के अनुसार, अमावस्या की रात दिवाली के अवसर पर एक भीषण युद्ध हुआ था जिसमें शाही परिवार के कई सदस्य वीरगति को प्राप्त हुए थे। तब से दिवाली पर काले वस्त्र पहनकर उन्हें श्रद्धांजलि देने की परंपरा चली आ रही है। भाजपा सांसद दीया कुमारी, पद्मनाभ सिंह, लक्ष्यराज सिंह, और गौरव सिंह सहित राजपरिवार की वर्तमान पीढ़ी भी इस परंपरा को पूरी निष्ठा से निभाती आ रही है।

काली पोशाक की ऐतिहासिक कथा

10वीं शताब्दी में मध्य प्रदेश के ग्वालियर में कछवाहा राजा सोध देव की मृत्यु के बाद जब उनके भाई ने गद्दी संभाली, तो उनकी रानी नाराज होकर जयपुर के खोह-नागोरियन इलाके में आकर रहने लगी और उन्होंने काली पोशाक पहकर ही दिवाली मनाई। तब से जयपुर के शाही परिवार में इस तरह की दिवाली मनाने का रिवाज शुरू हुआ।

भगवान राम के वंशज, शौर्य की परंपरा

जयपुर राजपरिवार कछवाहा वंश से ताल्लुक रखता है, जिन्हें रघुकुल वंश के भगवान राम का वंशज भी माना जाता है। ऐसे में यह परंपरा केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि धर्म, वीरता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।

सिटी पैलेस में होती है दिवाली की भव्य रस्म

जयपुर का सिटी पैलेस, दिवाली पर एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। रौशनी, आतिशबाज़ी और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच, राजपरिवार के सदस्य काले वस्त्रों में सजकर दिवाली की रस्में निभाते हैं। मेहमान, पर्यटक और शहरवासी इस शाही परंपरा को देखने के लिए हर साल उत्सुकता से इंतजार करते हैं। दिवाली की रात सिटी पैलेस रौशनी और श्रद्धा का संगम बन जाता है।

परंपरा जो आधुनिकता में भी जीवित है

जहां एक ओर आज की पीढ़ी परंपराओं से दूर होती जा रही है, वहीं जयपुर का राजपरिवार दिखाता है कि इतिहास, सम्मान और संस्कृति का निर्वाह कैसे किया जाता है। दिवाली पर काले वस्त्र पहनने की यह अनूठी परंपरा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान, बल्कि सामाजिक संदेश भी है कि बलिदान कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए।

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