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Saturday, March 7, 2026

आनंदपाल एनकाउंटर केस में पुलिस को बड़ी राहत, कोर्ट ने कहा— सेल्फ डिफेंस में हुई थी कार्रवाई

राजस्थान के चर्चित आनंदपाल सिंह एनकाउंटर मामले में पुलिस को बड़ी कानूनी जीत मिली है। पुनरीक्षण न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें सात पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या का संज्ञान लिया गया था। अदालत ने माना कि एनकाउंटर सेल्फ डिफेंस में हुआ और पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी निभा रहे थे।

कोर्ट ने माना— आनंदपाल ने खुद की थी फायरिंग

कोर्ट के अनुसार, मृतक आनंदपाल सिंह ने ऑटोमैटिक हथियार से पुलिस पर फायरिंग की थी, जिससे एक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गया था। अदालत ने कहा कि इस स्थिति में पुलिस का जवाबी एक्शन कानूनी और आत्मरक्षा में उचित था। इस फैसले के बाद राजस्थान पुलिस को बड़ी राहत मिली है, जबकि आनंदपाल के परिजनों ने हाई कोर्ट में अपील करने की बात कही है।

24 जून 2017 को हुआ था एनकाउंटर

यह घटना 24 जून 2017 की है, जब चूरू जिले के मालासर गांव में पुलिस ने कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल को घेर लिया था। आनंदपाल पर हत्या, लूट और फिरौती जैसे कई गंभीर अपराधों के मामले दर्ज थे। पुलिस की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) और RAC की टीम ने उसे सरेंडर करने के लिए कहा, लेकिन उसने AK-47 से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें आनंदपाल मारा गया। इस दौरान कमांडो सोहन सिंह और इंस्पेक्टर सूर्यवीर सिंह राठौड़ घायल हो गए थे।

परिजनों ने बताया था फेक एनकाउंटर

घटना के बाद आनंदपाल के परिजनों ने इसे फेक एनकाउंटर बताया था। जुलाई 2024 में एसीजेएम कोर्ट ने सात पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का संज्ञान लिया था।
इनमें तत्कालीन चूरू एसपी राहुल बारहठ, डीएसपी विद्या प्रकाश, इंस्पेक्टर सूर्यवीर सिंह, हेडकांस्टेबल कैलाश, कांस्टेबल धर्मवीर, सोहन सिंह और धर्मपाल शामिल थे।

पुलिस की दलीलें हुईं मजबूत साबित

पुलिस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जैन, राहुल चौधरी और उमेशकांत व्यास ने कोर्ट में दलीलें पेश कीं। उन्होंने सीबीआई की फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि आनंदपाल की गोली से ही पुलिसकर्मी घायल हुआ था। कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया था और बिना पर्याप्त साक्ष्यों के संज्ञान लिया गया था।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी किया हवाला

पुनरीक्षण कोर्ट ने कहा कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के खिलाफ बिना ठोस सबूत कार्रवाई करना उनके मनोबल को प्रभावित करता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में सावधानी और तथ्यों की गहन जांच आवश्यक है।

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