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Saturday, March 7, 2026

बीकानेर का अनोखा अग्नि नृत्य: कतरियासर गांव में धधकते अंगारों पर आस्था का जोश, 550 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवित

बीकानेर की सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक परंपराएं विश्व भर में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक है कतरियासर गांव में किया जाने वाला ‘अग्नि नृत्य’, जो आस्था, साहस और सिद्ध संप्रदाय की परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। बीकानेर से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित कतरियासर गांव में यह अनोखा अग्नि नृत्य सिद्ध समाज के लोग 550 वर्षों से भी अधिक समय से करते आ रहे हैं।

धधकते अंगारों पर नृत्य, मुंह में लेते हैं आग

इस अग्नि नृत्य में साधु व श्रद्धालु न केवल धधकते अंगारों पर नंगे पांव चलते हैं, बल्कि कई बार इन अंगारों को मुंह में भी लेते हैं। नृत्य के दौरान ‘फतेह–फतेह’ का उद्घोष करते हुए वे आग पर कूदते हैं और करतब दिखाते हैं। संगीत और नगाड़ों की थाप पर उनका जोश चरम पर होता है। यह नृत्य संत जसनाथ जी महाराज के सम्मान में किया जाता है और इसमें केवल पुरुष भाग लेते हैं।

कतरियासर धाम में साल में चार बार लगता है मेला

• श्रद्धालु गोरखमलिया समाधि स्थल पर सुबह धोक लगाते हैं
• शाम को होती है अग्नि नृत्य की प्रस्तुति
• इस दौरान जसनाथ जी द्वारा रचित रचनाओं का गायन होता है जैसे सिंम्भूधड़ो कोड़ो, गोरखछन्द आदि सिद्ध समाज के लोग गेरुआ रंग का साफा और सफेद परिधान धारण करते हैं। उनका कहना है कि बाबा जसनाथ जी का आशीर्वाद उनके साथ है, जिससे आग भी उन्हें जला नहीं पाती।

करतब और श्रद्धा का संगम

• एक बड़ा घेरा बनाकर लकड़ियां जलाकर धूणा किया जाता है
• घी से आहुति और चारों ओर पानी छिड़का जाता है
• गुरु की आज्ञा से नर्तक अंगारों पर प्रवेश करते हैं
• नृत्य के साथ-साथ अनेक करतब भी करते हैं। यह पूरा दृश्य न सिर्फ श्रद्धा का, बल्कि साहस और संतुलन की परीक्षा का प्रतीक बन जाता है।

परंपरागत भोजन भी मिलता है श्रद्धालुओं को

मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर महंत की ओर से परंपरागत खीचड़ा, कढ़ी और घी का भोजन भी कराया जाता है। यह जसनाथ जी की परंपरा का हिस्सा है, जो हर आगंतुक के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।

इतिहास में दर्ज है अग्नि नृत्य का सम्मान

इस अग्नि नृत्य की शुरुआत करीब 550 वर्ष पूर्व संकटकाल में हुई थी। यह नृत्य न केवल शारीरिक और नैतिक अनुशासन का प्रतीक बना, बल्कि विदेशी आक्रांताओं के समय सिद्ध समाज की सांस्कृतिक और आत्मिक पहचान का माध्यम भी बना। इतिहास बताता है कि जब मुगल बादशाह औरंगजेब ने सिद्धों को दरबार में बुलाया, तब उन्होंने दिल्ली में संत रुस्तम जी की अगुवाई में यह अग्नि नृत्य प्रस्तुत किया। इससे प्रभावित होकर उन्हें जागीर दी गई थी।

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