आपकी कलम से- डॉ डीपी शर्मा
भारत और रूस की मित्रता अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में एक अद्वितीय उदाहरण रही है। बदलते वैश्विक समीकरणों, शीतयुद्ध की समाप्ति, विश्व व्यवस्था में निरंतर शक्ति-पुनर्संतुलन के बावजूद, यह संबंध सात दशकों से अधिक समय तक स्थिरता, भरोसे और पारस्परिक सम्मान की नींव पर टिका रहा है। यही कारण है कि भारत-रूस मैत्री को “टाइम-टेस्टेड रिलेशनशिप” कहा जाता है।
भारत-रूस मित्रता के पक्ष
- रणनीतिक भरोसा और राजनीतिक स्थिरता
रूस स्वतंत्रता के बाद से ही भारत का विश्वसनीय साझेदार रहा है। 1971 के बांग्लादेश युद्ध से लेकर परमाणु ऊर्जा सहयोग तक, रूस ने कठिन समय में भारत का साथ दिया। यह भरोसा आज भी रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में दिखाई देता है।

- रक्षा सहयोग की मजबूत नींव
भारत के लगभग 60–70% सैन्य उपकरण वर्षों तक रूस से आते रहे। ब्रह्मोस जैसी संयुक्त परियोजनाएँ और S-400 जैसी उन्नत प्रणालियाँ इस साझेदारी की गहराई का प्रमाण हैं। रूस ने भारत की स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ाने में भी तकनीकी सहायता दी है।
- ऊर्जा सुरक्षा में योगदान
रूस तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के लिए एक बड़ा स्तंभ है। सस्ते कच्चे तेल की उपलब्धता ने हाल के वर्षों में भारत की ऊर्जा लागत को काफी स्थिर रखा है।
- अंतरिक्ष और विज्ञान-प्रौद्योगिकी में सहयोग
इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को गति मिली। ‘गगनयान’ मिशन में भी रूसी विशेषज्ञता महत्वपूर्ण है।
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में साझा दृष्टिकोण
भारत और रूस दोनों एक संतुलित, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन करते हैं। ब्रिक्स एससीसो जी20 जैसे मंचों पर दोनों देश एक-दूसरे के हितों को समझते हुए कार्य करते हैं।
भारत-रूस मित्रता के विपरीत प्रभाव
- रूस-पश्चिम टकराव का दबाव
यूक्रेन संकट के बाद रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों ने वैश्विक कूटनीति और व्यापार को जटिल बनाया है। भारत को रूस के साथ संबंधों को बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ भी संतुलन बनाना पड़ रहा है।
- रक्षा आयात पर अत्यधिक निर्भरता
रूस पर हथियारों के लिए अधिक निर्भरता ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कभी-कभी सीमित किया है। स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड में देरी जैसी समस्याएँ भी सामने आई हैं।
- रूस-चीन निकटता
रूस और चीन की बढ़ती साझेदारी भारत के लिए चिंता का विषय है। सीमा विवादों और इंडो-पैसिफिक रणनीति के संदर्भ में यह समीकरण भारत के हितों को प्रभावित कर सकता है।
- आर्थिक संबंध अपेक्षाकृत कमजोर*
राजनीतिक और रक्षा संबंधों की तुलना में भारत-रूस का व्यापार बहुत कम है। व्यापार का पैमाना और विविधता दोनों ही सीमित हैं, जिससे संबंधों के आर्थिक आयाम कमजोर दिखते हैं।
- नई भू-राजनीतिक प्राथमिकताएँ
रूस अब अधिकतर एशिया-केंद्रित और पश्चिम-विरोधी धुरी में झुक गया है, जबकि भारत की नीतियाँ रणनीतिक बहुलता और आर्थिक वैश्वीकरण पर आधारित हैं। यह दोनों की प्राथमिकताओं में असंगति उत्पन्न कर सकता है।
समय के साथ अनुकूलन की आवश्यकता
भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी शक्ति इनका ऐतिहासिक भरोसा और पारस्परिक सम्मान है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की नई चुनौतियों—चीन का उदय, रूस-पश्चिम संघर्ष, भारत की अमेरिका से बढ़ती साझेदारी—इन मैत्री संबंधों को एक नए स्तर की कूटनीतिक सूझबूझ की आवश्यकता बताते हैं।
भारत और रूस को अपने संबंधों को रक्षा-केंद्रित मॉडल से आगे बढ़ाकर आर्थिक, तकनीकी, शिक्षा, ऊर्जा परिवर्तन, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे भविष्य के क्षेत्रों तक विस्तारित करना होगा। तभी यह “दीर्घकालिक मित्रता” आने वाले दशकों में भी उतनी ही मजबूत और प्रासंगिक बनी रह सकेगी, जितनी आज है।
इसलिए, भारत-रूस मैत्री न केवल अतीत की विरासत है, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का भी एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है—यदि दोनों देश समय के साथ अपने सहयोग को नई दिशा और ऊर्जा दे पाते हैं।


