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Saturday, March 7, 2026

रहस्यों से भरा है भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर, कपाट खोलने के लिए हथोड़ा लेकर जाते है पुजारी

दुनिया में कई मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए मशहूर हैं, लेकिन केरल के कोट्टायम जिले का तिरुवरप्पु कृष्ण मंदिर उनमें सबसे अलग है। केरल के कोट्टायम जिले के तिरुवरप्पु में स्थित भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यह मंदिर डेढ़ हजार साल पुराना माना जाता है और खास बात यह है कि यह साल के 365 दिन, प्रतिदिन 23 घंटे 58 मिनट तक खुला रहता है। माना जाता है कि यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के प्रतिष्ठित विग्रह हमेशा भूख में रहते हैं। इसी वजह से मंदिर को लगभग पूरे दिन खुला रखा जाता है ताकि भगवान को समय-समय पर भोग अर्पित किया जा सके। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहाँ पूजा और भोग से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि तिरुवरप्पु का यह मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बना हुआ है।

यह मंदिर करीब डेढ़ हजार साल पुराना माना जाता है और इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यह साल के 365 दिन, प्रतिदिन 23 घंटे 58 मिनट खुला रहता है। मंदिर केवल सुबह 11.58 बजे से 12.00 बजे तक यानी 2 मिनट के लिए ही बंद होता है। लोक मान्यता है कि यहाँ भगवान कृष्ण का विग्रह कंस का वध करने के बाद थके हुए स्वरूप का है और वे हमेशा भूख की अवस्था में रहते हैं। इसी कारण उन्हें लगातार भोग अर्पित किया जाता है। इस मंदिर की एक और अनोखी परंपरा यह है कि पुजारी को जब मंदिर की चाबी दी जाती है तो उसके साथ एक कुल्हाड़ी भी दी जाती है। माना जाता है कि यदि चाबी से दरवाजा खोलने में थोड़ी भी देरी हो जाए तो पुजारी को कुल्हाड़ी से दरवाजा तोड़ने की अनुमति होती है, ताकि भगवान को भोग लगाने में विलंब न हो।

केरल के कोट्टायम जिले के तिरुवरप्पु में स्थित भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर अपनी असाधारण परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर करीब डेढ़ हजार साल पुराना है और यहाँ भगवान को हमेशा भूखा माना जाता है। इसी कारण मंदिर प्रतिदिन 23 घंटे 58 मिनट खुला रहता है और दिनभर में 10 बार नैवेद्य पूजा की जाती है। माना जाता है कि अभिषेकम के बाद जब स्वामी का सिर पहले सूख जाता है और नैवेद्य चढ़ने तक शरीर पूरी तरह सूख जाता है, तो भगवान कृष्ण को त्वरित भोग अर्पित किया जाना आवश्यक है। इस मंदिर की सबसे खास परंपरा यह है कि यह ग्रहण के समय भी बंद नहीं होता। लोक मान्यता है कि एक बार मंदिर को ग्रहण के दौरान बंद कर दिया गया था। जब पुजारी ने दरवाजा खोला तो पाया कि भगवान की कमर की पट्टी नीचे खिसक गई थी। उस समय उपस्थित आदि शंकराचार्य ने समझाया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भगवान भूखे रह गए थे। तब से यह परंपरा पूरी तरह बदल गई और मंदिर ग्रहण काल में भी बिना रुके खुला रहता है। यह मंदिर आस्था का ही नहीं, बल्कि परंपराओं की अद्भुत मिसाल भी है, जहाँ हर व्यवस्था भगवान कृष्ण को भूखा न रखने की भावना से जुड़ी हुई है।

भगवान का सोने का समय भी बेहद अनोखा है — रोज़ाना सुबह 11.58 बजे से 12.00 बजे तक, यानी केवल दो मिनट। इसके बाद दोपहर 12 बजे मंदिर फिर से खुल जाता है और अगले दिन तक लगातार खुला रहता है। इस मंदिर की एक विशेष परंपरा यह है कि प्रसादम का सेवन किए बिना कोई भी भक्त वापस नहीं जा सकता। हर दिन 11.57 बजे मंदिर बंद करने से पहले पुजारी जोर से पुकारते हैं — “क्या कोई भी यहाँ है?” ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी भक्त प्रसाद ग्रहण कर चुके हों। माना जाता है कि जो भी श्रद्धालु यहाँ आकर प्रसाद ग्रहण करता है, उसे जीवनभर भूख का कष्ट नहीं सहना पड़ता और भगवान उसकी सतत देखभाल करते रहते हैं। यह अद्भुत परंपरा इस मंदिर को दुनिया के सबसे अनोखे और अद्वितीय मंदिरों में शामिल करती है।

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