जयपुर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात‘ कार्यक्रम की 127वीं कड़ी में देशवासियों को संबोधित किया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सवाई मानसिंह स्टेडियम के इंडोर हॉल में ‘मन की बात‘ कार्यक्रम को सुना। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में दीपावली और आने वाली छठ पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि देशभर के बाजारों में रौनक है। हर तरफ श्रद्धा, अपनापन और परंपरा का संगम दिख रहा है। छठ का महापर्व संस्कृति, प्रकृति और समाज के बीच की गहरी एकता का प्रतिबिंब है। छठ के दौरान घाटों पर समाज का हर वर्ग एक साथ खड़ा होता है। ये दृश्य भारत की सामाजिक एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जीएसटी बचत उत्सव को लेकर भी लोगों में बहुत उत्साह दिखा है। इस बार त्योहारों के दौरान बाजारों में स्वदेशी सामानों की खरीदारी बढ़ी है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे ग्रन्थों के अनुसार वृक्ष और वनस्पतियां धन्य हैं, जो किसी को भी निराश नहीं करते। हमें भी चाहिए, हम जिस भी इलाके में रहते हैं, पेड़ अवश्य लगाएं। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ के अभियान को हमें और आगे बढ़ाना है। उन्होंने अम्बिकापुर के गारबेज कैफे और बेंगलुरु के इंजीनियर श्री कपिल शर्मा का जिक्र किया, जिन्होंने स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण काम किया है।
पीएम मोदी ने कहा कि 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती पूरे देश के लिए विशेष अवसर है। उनके विराट व्यक्तित्व में अनेक गुण एक साथ समाहित थे। सरदार पटेल ने देश की एकता और अखंडता के लिए अद्वितीय प्रयास किए। प्रधानमंत्री ने आमजन से 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जयंती के उपलक्ष्य पर देश-भर में आयोजित होने वाली रन फॉर यूनिटी में भाग लेने का आह्वान किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्र गीत ‘वन्देमातरम्’ का शब्द हमारे हृदय में भावनाओं का उफान ला देता है। ‘वन्देमातरम्’ शब्द में बहुत भाव और ऊर्जाएं हैं। ये हमें माँ-भारती के वात्सल्य का अनुभव कराता है। उन्होंने कहा कि आगामी 7 नवंबर को हम ‘वन्देमातरम्’ के 150वें वर्ष के उत्सव में प्रवेश करने वाले हैं। इसे हमें यादगार बनाना है और आने वाली पीढ़ी के लिए इस संस्कार सरिता को आगे बढ़ाना है।
पीएम मोदी ने कहा कि भाषा किसी भी सभ्यता के मूल्यों और परंपराओं की वाहक होती है। संस्कृत ने ये कर्तव्य हजारों वर्षों तक निभाया है। लेकिन गुलामी के कालखंड और आजादी के बाद भी संस्कृत लगातार उपेक्षा का शिकार हुई। इस वजह से युवा-पीढ़ियों में संस्कृत के प्रति आकर्षण भी कम होता चला गया। उन्होंने कहा कि अब समय बदल रहा है। संस्कृति और सोशल मीडिया की दुनिया ने संस्कृत को नई प्राणवायु दे दी है। इन दिनों कई युवा संस्कृत को लेकर बहुत रोचक काम कर रहे हैं।


