आस्था, विश्वास और भक्ति का सबसे बड़ा केंद्र यानी राजस्थान का सीकर स्थित पवित्र खाटू धाम। जहां बीते दिनों पुजारी सेवक महासंघ का द्वितीय महाधिवेशन आयोजित किया गया। लगातार दो दिनों तक चले इस महाधिवेशन में प्रदेशभर से करीब 8 हजार पुजारी शामिल हुए। इस दौरान पुजारियों को मजबूत करने और उनके अधिकारों की रक्षा को लेकर व्यापक स्तर पर चर्चा हुई। यह महज एक चर्चा नहीं बल्कि पुजारियों की आवाज़, उनके अधिकारों की आवाज और सनातन धर्म की अस्मिता का उद्घोष था। महाधिवेशन में पुजारियों ने मंच से राज्य सरकार के सामने अपनी मांगों को स्पष्ट तौर पर रखा।
पुजारियों ने कहा- प्रदेश में ‘सनातन बोर्ड’ का गठन किया जाए क्योंकि भारत की सभ्यता और संस्कृति का मूल आधार ही सनातन धर्म है। इसमें सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्तव्य की भावना निहित है। आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में सनातन के नियमों का संरक्षण और सही दिशा में इनका प्रसार समय की मांग है। पुजारियों का कहना था कि, सनातन बोर्ड एक समाज को एकजुट कर सनातन परंपराओं, शास्त्रों और संस्कारों की वैज्ञानिक व व्यवहारिक व्याख्या करने का काम करेगा। साथ ही इसके माध्यम से न सिर्फ युवाओं को सही मार्गदर्शन मिलेगा बल्कि वे अपने धर्म और संस्कृति पर गर्व भी महसूस कर सकेंगे।


महाधिवेशन में सभी जिला अध्यक्षों का सम्मान किया गया। इस मौके पर महासंघ के संरक्षक महंत मोहनदास जी ने कहा कि “पुजारियों को एकजुट होना बेहद जरुरी है और शीघ्र ही सरकार को 13 सूत्री मांगों का ज्ञापन सौंपने के साथ-साथ सनातन बोर्ड के गठन का भी संकल्प लिया।” रैवासा धाम के पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने भी कहा कि – “जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक सुनवाई संभव नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिरों की आय से अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों का विकास किया जा रहा है और सनातन मंदिरों की उपेक्षा की जा रही है, जो सरासर अन्याय है।” महाधिवेशन में महाकाल मंदिर उज्जैन के पुजारी व महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश पुजारी ने कहा कि “सनातन सबसे प्राचीन धर्म है, लेकिन आज पुजारियों की स्थिति बेहद नाजुक है। उन्होंने कहा कि सरकारें चर्च-मस्जिदों में हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन मंदिरों पर पूरी तरह नियंत्रण किया जा रहा है।”

महाधिवेशन में पुजारियों ने सरकार के सामने अपनी प्रमुख मांगे रखी जिसमें – सनातन बोर्ड का गठन, अराजकीय भूमिहीन मंदिरों के पुजारियों को 30 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय, प्रोटेक्शन बिल लागू करना, ग्रामीण मंदिरों के पट्टे पुजारियों को देने, मंदिरों को निशुल्क बिजली-पानी सुविधा, मंदिर संपत्ति विवादों के लिए विशेष ट्रिब्यूनल, पुजारी कल्याण कोष का गठन और बोर्ड का पुनर्गठन, भोग राशि न्यूनतम 10 हजार रुपये तय करना, कृषि योजनाओं में पुजारियों को समान लाभ और मंदिर माफी भूमि का गैर-कृषि उपयोग करने की अनुमति देना शामिल है। महाधिवेशन में तय किया गया कि यदि सरकार पुजारियों की मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो पुजारी समुदाय एकजुट होकर आंदोलन करेगा और चुनाव के समय सरकार व प्रतिनिधियों से सीधे जवाब मांगेगा।

इस अधिवेशन के दौरान मेट्रो मास अस्पताल की चिकित्सकीय टीम भी कार्यक्रम स्थल पर मौजूद रही। जिसने वहां पधारे सभी आगंतुकों को निशुल्क चिकित्सकीय जांच की और स्वस्थ निरोगी रहने के जरुरी टिप्स दिए। मंदिर… केवल ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं बल्कि सनातन संस्कृति की आत्मा हैं, और समाज की धड़कन हैं। वहीं पुजारी केवल कर्मकांड करने वाले लोग नहीं… बल्कि वे सेतु हैं, जो इस आस्था और परंपरा को जोड़ने का काम करते है। इन पुजारियों की आवाज़… उनकी पीड़ा… उनकी अपेक्षा… राज्य और समाज दोनों के लिए चुनौती बनकर सामने खड़ी है। पुजारियों की मांगे सरकार तक पहुंचती है या फिर नहीं? इसका जवाब भविष्य की गहराइयों में दबा है। आप बने रहे हमारे साथ और अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखें। वीडियो पसंद आया तो इसे लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलना।


